छत्तीसगढ़ में जंगल सत्याग्रह

छत्तीसगढ़ में जंगल सत्याग्रह

यंहा जंगल सत्यग्राह होने का कारण था अंग्रेजो का वन कानून बनाना। उस समय छत्तीसगढ़ की अधिकांश आबादी खासकर के आदिवासियों की जीविका का साधन वन उत्पाद पर निर्भर था परन्तु अंग्रजो के द्वारा बनाई गयी वन निति से आदिवासियों के अधिकारों का हनन होने लगा और इसके विरोध में छत्तीसगढ़ में जंगल सत्याग्रह का प्रारम्भ हुआ।

सिहावा नगरी जंगल सत्याग्रह –

यह सत्याग्रह 1922 में हुआ था। पंडित सुंदरलाल शर्मा, छोटेलाल श्रीवास्तव, नारायण राव मेघावाले आदि इस जंगल सत्याग्रह के नायक थे। सिहावा नगरी जंगल सत्याग्रह छत्तीसगढ़ का प्रथम जंगल सत्याग्रह था।

अंग्रेजो द्वारा वनो को आरक्षित घोषित करना ही इस सत्याग्रह का प्रमुख कारण था। लोगो ने आरक्षित वनो का उपयोग करके वन कानून का विरोध किया।

गट्टासिल्ली सत्याग्रह-

अंग्रेजो द्वारा बनाये गए वन कानून स्थायी लोगो के लिए मुसीबत बनती गयी। धमतरी के सिहावा खंड के ठेमली गांव के वनरक्षित क्षेत्र में मवेशियों को घास चरने के अपराध में गट्टासिल्ली के कांजी हाउस में डाल दिया गया।

इसी मवेशियों को छुड़वाने हेतु यह सत्याग्रह किया गया। यह सत्याग्रह सफल रही और मवेशियों को छोड़ दिया गया। नारायण राव मेघावाले, नाथू जगताप छोटे लाल श्रीवास्तव ने यह सत्याग्रह किया था।

रुद्री- नवागांव जंगल सत्याग्रह-

वन कानून के विरोध में 22 अगस्त 1930 को बड़ी संख्या में सत्याग्रहियों ने नवागांव स्थित रुद्री वनविभाग की सुरक्षित घास को काट कर कानून का उल्लंघन करने का निर्णय लिया।

इस कार्य को अंजाम देने वाले थे नारायण मेघावाले, जगताप आदि परन्तु जैसे ही यह सूचना अंग्रेजो को मिली उन्होंने सभी लीडर को गिरफ्तार कर लिया तथा वंहा धारा 144 लगा दिया। रुद्री पहुंची भीड़ पर अंग्रजो द्वारा गोली चलाई गयी जिसमे सिंधु कुमार नामक व्यक्ति मारा गया।

तमोरा जंगल सत्याग्रह –

इसके लीडर थे यतियतन लाल। सत्याग्रहियों ने तमोरा नामक गांव से जंगल की ओर प्रस्थान की और सत्याग्रह की शुरुवात की। वंहा की बालिका दयावती ने रेंजर को थप्पड़ मार दिया था। जिसके कारण सत्याग्रह उग्र रूप धारण कर लिया।

सविनय अवज्ञा आंदोलन के समाप्ति के साथ ही यह सत्याग्रह भी समाप्ति हो गया।

छुई खदान जंगल सत्याग्रह –

1938 में छुई खदान जंगल सत्याग्रह हुआ जिसके नेता थे समारू बरई। उस समय छुई खदान रियासत में कांग्रेस की स्थापना हुई थी। जिसका उद्देश्य जनता को सरकारी शोषण से बचाना था। जनता ने मिल कर वंहा जंगल सत्याग्रह आरम्भ किया था।

बदराटोला जंगल सत्याग्रह –

21 जनवरी 1939 को बदराटोला नमक गांव से जंगल सत्याग्रह की शुरवात हुई। जिसके नेता रामधीन गोंड थे। इस आंदोलन में करीब 300 – 400 लोग शामिल हुए थे। इस सत्याग्रह को रोकने के लिए सरकार ने कई हथकंडे अपनाये। लोगो को गिरफ्तार किया गया।

अहिंसावादी आंदोलन पर अंग्रेजो ने लाठिया बरसाई। कई लोग घायल हुए पर लोगो ने सत्याग्रह करना जारी रखा। जब अंग्रेज नाकाम हो रहे थे तो उन्होंने निहत्थे जनता पर गोलिया चलाई जिसके चलते इस आंदोलन के नेता रामधीन गोंड की मृत्यु हो गयी और कई लोग घायल हुए।

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