हिंदी साहित्य में रीतिकाल की उपलब्धियां

Hindi sahitya: Ritikal

रीतिकाल की उपलब्धियां(RITIKAAL KI UPLBDILIYAN):

ऐसी क्या बात है कि,  हिंदी आचार्यों के दोष पहले सामने आते हैं और गुण बाद में ??

हिंदी आचार्यों के दोष

पहला दोष : सिद्धांत प्रतिपादन में मौलिकता का अभाव

काव्यशास्त्र में मौलिकता की दो कोटियां हैं

  1.  नवीन सिद्धांतों की उद्भावना ,और
  2.  प्राचीन सिद्धांतों का पुनरख्यान।

हिंदी के रीती आचार्य निश्चय ही किसी नवीन सिद्धांत का विस्तार नहीं कर सके। किसी ऐसे आधारभूत सिद्धांतों का प्रतिपादन जो काव्य चिंतन को नवीन दिशा प्रदान कर सके संपूर्ण रीतिकाल में संभव नहीं हुआ। वास्तव में हिंदी की रीति कवियों ने आरंभ से ही गलत रास्ता अपनाया और उन्होंने मौलिकता का विकास विस्तार के द्वारा ही करने का प्रयास किया ।

उदाहरण के लिए,

ध्वनि का भेद विस्तार हजारों तक नायिका भेद की संख्या सैकड़ों तक पहुंच चुकी थी। अलंकार वर्णन शैली को छोड़ वर्ण्य शैली के क्षेत्र में प्रवेश करने लग गए थे . लक्षणा और दोषादि की सूक्ष्म भेद एक दूसरे की सीमा का उल्लंघन कर रहे थे। परिणामतः भारतीय काव्यशास्त्र कि वह स्वच्छ व्यवस्था जो मम्मट समय में स्थित हो चुकी थी ,अस्त व्यस्त हो गई थी।

दूसरा दोष: अस्पष्ट और उलझा विवेचन

दूसरा रीति आचार्यों का दूसरा दोष यह था कि उनका था कि उनका विवेचन अस्पष्ट और उलझा हुआ था. एक तो कुछ कवियों का शास्त्र ज्ञान अपने आप में निभ्रांत नहीं था और दूसरा पद्य में साहित्य के गंभीर प्रश्नों का समाधान संभव नहीं था ।

कारण:

उपर्युक्त दोषों के लिए अनेक परिस्थितियां उत्तरदायी थी . पंडितराज को छोड़ को छोड़ कोई आचार्य मौलिक चिंतन का प्रमाण नहीं दे सका ।  उसमें कवि शिक्षा का लक्ष्य था रसिकों को को सामान्य काव्य रीति की शिक्षा देना , जिज्ञासु मर्मज्ञ के लिए कर्म अथवा काव्यास्वाद के रहस्यों का व्याख्यान करना नहीं।

रीति आचार्यों की योगदान का मूल्यांकन

काव्यशास्त्र के क्षेत्र में आचार्यों की सामान्यतः 3 वर्ग है:

  • उद्भावक आचार्य

पहला उद्भावक आचार्य, जिन्होंने मौलिक सिद्धांत प्रतिपादन का श्रेय प्राप्त है ,जैसे भरत, वामन, आनंदवर्धन, भट्टनायक, अभिनवगुप्त, कुंतल ।

  • व्याख्याता आचार्य

दूसरा व्याख्याता आचार्य जो नवीन सिद्धांतों की भावना न कर प्राचीन सिद्धांतों की आख्यान  करते थे । जैसे, मम्मट, विश्वनाथ और पंडितराज जगन्नाथ ।

  • कवि शिक्षक

तीसरा वर्ग है कवि शिक्षकों का । जिनका लक्ष्य अपने स्वच्छ व्यवहारिक ज्ञान के आधार पर सरस सुबोध पाठ्यग्रंथ प्रस्तुत करना होता है । इसके अंतर्गत जयदेव, अप्पय ,दीक्षित ,केशव ,मिश्र ,भानुदत्त आदि की गणना होती है।

हिंदी के रीति आचार्य स्पष्ट रूप से प्रथम श्रेणी में नहीं आते . उन्होंने किसी व्यापक आधारभूत काव्य सिद्धांत का प्रवर्तन ही नहीं किया ।  उनमें किसी भी प्रकार की प्रतिभा नहीं थी। दूसरी श्रेणी में सर्वांग निरूपक आचार्य आचार्य की गणना की जा सकती है . वह इस स्थान पर के अधिकारी भी नहीं हो सकते। वे न शास्त्रकार थे, न शास्त्र के भाष्यकार ।  उनका काम शास्त्र की की परंपरा को सरस रूप में हिंदी में अवतरित करना था और इसमें निश्चय ही कृतकार्य हुए। उनके कृतित्व का मूल्यांकन इसी आधार पर होना चाहिए।

निष्कर्ष:

हिंदी के रीति आचार्य ने भारतीय काव्यशास्त्र की परंपरा को हिंदी में सरस रूप में अवतरित किया।  इस प्रकार भी हिन्दी काव्य को शास्त्र चिंतन की पौढ़ि प्राप्ति हुई और शास्त्रीय विचार सरस रूप में प्रस्तुत हुए। भारतीय भाषाओं में हिंदी को छोड़ अत्यंत अन्यत्र कहीं भी यह प्रवृत्ति नहीं मिलती। इसके अपने दोष हो सकते हैं परंतु वर्तमान हिंदी आलोचना पर इसका प्रभाव ही स्पष्ट है।

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